तू धरा है या
जननी है मेरी,
मैं तेरा ऋणी
शिशु सा कहीं.
तू ही शाश्वत
मैं हूँ नश्वर,
तू जीवन दायिनी
हो जैसे ईश्वर.
तेरी ही अंजुरी
से मिला है अमृत,
ये मनुष्य जीवन
तुझे ही अर्पण.
रवि का तेज
शशि सी शीतल,
अग्नि सी दहके
है नीर सी निर्मल.
ममता बिखराए
तो स्वर्ग है तू,
जो बिखर गयी
तो नर्क भी तू.
वो हिन्दू ये मुस्लिम
ये पूर्व वो पश्चिम,
सभी को वरदान तेरा
मिले आसमान तेरा.
कहीं ओस की निर्मल बूँद
या लावा हो तप्त कहीं,
तू दोनों का भार उठाये
शांत भी है निर्लिप्त कहीं.
तेरी ही कोख में
पले हर जीवन,
हर एक पुष्प का
तू ही है मधुवन.
हम तेरे उपासक
तू ही है सिद्धि,
अब क्या मैं मांगू
तू ही है रिद्धि.
प्रदत्त करूँ ये ऋण
कहे अनुरागी मन,
तब मुक्ति मिले मुझे
होम हो यह तन.
तू धरा है या
जननी है मेरी,
में तेरा ऋणी
शिशु सा कहीं...
