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Sunday, June 1, 2014

इश्क का खेल

इश्क पर जोर ए खुदा न चले
दरमियाँ कोई अब फासला न चले
जब दौर हो उल्फत का मुहब्बत का
सोच ए जहन का सिलसिला न चले
तेरी ही रिहाइश आँखों में धड़कन में
बिन तेरे साँसों का काफिला न चले
न कर परवाह मज़हब की माशरे की
इस इबादत में किसी का फतवा न चले
न देख दुनिया को इश्क के खेल में "नील"
खेलों के इस मेले में कोई और तमाशा न चले

Friday, April 25, 2014

 इश्क़ की तपिश है क्या कहिये 

दिल पर दबिश है क्या कहिये 

कुछ हसरतें, शिद्दतें और बेचारगी 

अजब ये खलिश है क्या कहिये