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Sunday, June 1, 2014

इश्क का खेल

इश्क पर जोर ए खुदा न चले
दरमियाँ कोई अब फासला न चले
जब दौर हो उल्फत का मुहब्बत का
सोच ए जहन का सिलसिला न चले
तेरी ही रिहाइश आँखों में धड़कन में
बिन तेरे साँसों का काफिला न चले
न कर परवाह मज़हब की माशरे की
इस इबादत में किसी का फतवा न चले
न देख दुनिया को इश्क के खेल में "नील"
खेलों के इस मेले में कोई और तमाशा न चले

Friday, April 25, 2014

 इश्क़ की तपिश है क्या कहिये 

दिल पर दबिश है क्या कहिये 

कुछ हसरतें, शिद्दतें और बेचारगी 

अजब ये खलिश है क्या कहिये 

Sunday, July 25, 2010

स्वार्थी नील

वो एक शनिवार की  शाम... फिर कोई मॉल..किसी फिल्म का देखना..
पत्नी की खरीदारी..बच्चों की फरमाइश..
पर इस सबसे पहले ही..
सामने आ गया अनायास वो बच्चा..
कपड़ों के नाम पर थे कुछ चीथडे ..
झुर्रियों से बना मासूम  चेहरा..
आखों में  आंसू कम और सूनापन  ज्यादा..
निराशा से संपन्न सूरत.
एक बचपन जैसा कुछ ..  बुढ़ापे की  ओर बढता हुआ ..
उस खोमचे के नीचे पड़े  झूठे पत्तों में कुछ तलाशता हुआ..
खामखाह  आ गया मेरा पास और कह उठा..
बाबूजी ..बहुत भूख लगी है..कुछ मिलेगा क्या..
मन द्रवित हो आया..दिल कचोट गया..
पर जेब में छुट्टा निकला ही नहीं  ..
और मैं आ गया अन्दर..चुपचाप..अपनों के पास..
...देखते ही बोले..चलो अब बर्गर खायेंगे....भूख लगी है..
बस ५०० के नोट में आ गए वो और कुछ  टाफियां..
सब खुश ..चहकना..खिलखिलाना..पर अचानक वहां  हवा विलुप्त होने लगी..
घुटन बढ़ने लगी..जबकि एसी तो था वहां..
लगा जैसे बेहोश हो जाऊँगा..
सो खुली हवा में सांस लेने बाहर आ गया...
पर सामने था फिर वही मंजर..
वही बचपन..वही पत्ते.. वही आँखें..
पैर अनायास ही उधर बढ़ने  लगे..
साथ ही उन आँखों में आशा भी ..
मैं  भी कह उठा उस खोमचे वाले से..
इसको खिलाना सब जो ये चाहे..
अचानक हवा का तेज झोंका आया..
मौसम सुहाना सा होने लगा...घुटन अब नदारद थी..
अन्दर वो सब खुश थे और अब बाहर मैं  भी..
इंसान भी कितना स्वार्थी होता है...
है न??

Sunday, June 20, 2010

वो जो कहा था..

क्यूँ मैंने कहा था..
गर कह भी दिया था..
तो क्या इतना बड़ा सच था वो..
कि अब उस कहे का गूँज..
सुनाई देती रहेगी..
मेरे तुम्हारे बीच..
हर वक़्त..
हर लम्हा..
मेरे कहने से पहले तो ..
ऐसा न था..
तुम मिलती थीं.. बेपरवाह सी..
वही मासूम हंसी..वही भोलापन..
मैं  भी तो हंस लेता  था बस तुम्हारे साथ  ही..
और उसी एक पल में ..तुम पूछ बैठी थीं..
तुम  दोगे न मेरा साथ ...ज़िन्दगी भर???
और मैं अनजान कह बैठा..यही..
फिर  ऐसा क्या हुआ  कि बस..
तुम मिलती तो हो अब भी..
पर ये हंसी वो नहीं है..
न चेहरे पर अब है मासूमियत..
कुछ डर बचा है
..और थोडा सा..
टूटे हुए विश्वास का सच..
पर मैंने ऐसा भी क्या कह दिया  था??..
बस यही तो...
"वक़्त के साथ हालात भी बदलते हैं और ..
इंसान भी.."

Monday, June 14, 2010

घर फूँक तमाशा

उस दिन रविवार था सो हम घर पर ही विराजमान थे.बस पलंग पर कब्ज़ा जमाकर दो तीन  अखबार और एक टीवी से काम चला रहे थे. बीच बीच में जब भी मन होता,मैडम को आवाज लगा कुछ भी मंगवाए जा रहे थे, खाए जा रहे थे और उनकी जहरीली नजरों से बेपरवाह, बेशर्म होकर सन्डे मना रहे थे कि अचानक सिम्मी जी का आगमन हो गया.सिम्मी जी...यानी सिमरन चड्ढा, हमारे महल्ले की एकमात्र संजीवनी, कम से कम महल्ले के हर पुरूष का तो यही मानना है, अब वो चाहे इसको अपनी बीवी के डर से कहे या न कहे. हाँ बस एक गुरिंदर जी इस मत से सहमत नहीं थे. कारण??उनके पति जो ठहरे. ५ साल के बेटे बंटू की  मम्मी हैं लेकिन कोई मानता ही नहीं,खासकर हम सब भले मानुष.


 हमारे घर से कुछ विशेष प्रेम है उनको,प्रेम तो हमको भी है लेकिन मैडम से बचकर ही, खैर तो बात उनके आने की  हो रही थी..आते ही जैसे ही हमको देखकर बोलीं " क्या भाईसाहब, आप यहाँ क्या कर रहे हो??.उधर वो भी अकेले बैठें हैं..उनको ज्वाइन करो न, मैं हूँ इधर." उनके मुहं से भाईसाहब सुनते ही हमारा सारा मूड ही चौपट हो गया और हमने भी कह दिया " अजी क्यूँ उनको परेशान करना, आप यहाँ हैं तो वो वहां चैन से हैं न."...हमारे कहे को सुन कर भी अनसुना कर दिया उन्होंने और बिंदास होकर हमारी जागीर यानी कि पलंग के एक कोने पर कब्ज़ा जमाकर बैठ गयीं.तभी हमारी मैडम भी आ गयीं, वैसे भी सही जगह पर गलत वक़्त पहुँचने का रोग संसार की हर पत्नी को होता है ..सो हमने भी दिल पर पत्थर रख लिया और पूछ बैठे- कहिये सिम्मी जी, आज क्या मसला है जो सन्डे के दिन गुरिंदर जी को छोड़ कर आयीं हैं??.कोई ख़ास बात??..सुनते ही तपाक से बोलीं"ये बताइए भाईसाहब कि कॉमनवेल्थ गेम्स के टिकट कहाँ से मिलेंगे?? हमारे उनको तो जरा भी इंटेरेस्ट नहीं है."सुनकर हमने कहा-अरे इसमें क्या है सिम्मी जी,वो तो आप कहीं से भी ले सकती हैं न, कहें तो हम लाकर दे देंगे.


इतना सुनते ही मैडम जल कर बोलीं- " हाँ, क्यूँ नहीं, तुमने कहा है तो  टिकट  कल ही ला देंगे,वैसे मैं इनको सुबह एक ब्रेड भी लाने को बोलूं तो पैरों में सारा दर्द उसी वक़्त आ जाता है. गाँधी जी बातों पर  अमल करते हुए यानी "बुरा मत सुनो" के तर्ज पर हमने अपनी मैडम कि बात को अनसुना किया और सिम्मी जी से पूछ बैठे- पर आपकी इन खेलों में रुचि कहाँ से जाग गयी?? आज तक तो कभी देखा नहीं हमने आपको कोई खेल देखते हुए. आप तो बस अपने स्कूल और कम्पयूटर में ही बिज़ी रहती हैं. दरअसल सिम्मी जी एक सरकारी स्कूल में कम्पयूटर शिक्षिका हैं. सुनकर सिम्मी जी तीखे स्वर में बोलीं-खेल जाएँ  भाड़ में जी, मुझको तो बस ये देखना है कि इतने वर्षों से महज दस दिन के हंगामे पर जो घर फूँक तमाशा किया जा रहा है वो आखिर है क्या??



सुनकर हम अचंभित हो गए और कहा-" अरे ऐसा क्यूँ बोल रहीं है आप? ऐसे आयोजनों से देश का नाम होता है, विश्व में हमारी एक पहचान स्थापित होती है. हम भी दुनिया  को बता सकते हैं कि हमारा देश भी  ऐसे आयोजनों को आसानी से कर सकता है." सुनकर व्यंग भरे अंदाज में बोलीं वो-" वाह भाईसाहब वाह ! दस दिन के नाटक से हमारे देश का  नाम रोशन  हो जाएगा, वो नाम जो करोड़ों बच्चों कि बेवक्त मौत, अशिक्षा, कुपोषण, भ्रष्टाचार जैसे न जाने  कितने  मुद्दों से दागदार  है, उसको ये खेल धो देंगे. ऐसा सोचना भी खूब है. मान गए आपको." सुनकर हम सिटपिटा गए और बचाव कि मुद्रा में आकर बोले-" ऐसा कैसे कह सकती हैं आप?? देखिये दिल्ली वासियों का इस खेलों के बहाने कितना  भला हो रहा है, आपको मालूम है वहां २६ फ्लाईओवर, १८ रेलवे पुल, मेट्रो का विस्तार, सड़कों का चौडीकरण , एक पूरा खेल गाँव और पता नहीं क्या क्या काम हो रहे हैं.कम से कम देश की राजधानी तो संवर जायेगी, ऐसे ही सोच लीजिये." ये सुनकर तो उनका गुस्सा और भड़क गया -" हद है यानी कि, हमारे देश में जो भी जरूरी काम होना है उसके लिए इन बहानों की  जरुरत होती है. ये चीज़ें क्या इसलिए पहले ही नहीं बन जानी चाहिए थीं कि दिल्ली को उनकी जरुरत है? यानी कि खेल होंगे तभी दिल्लीवासियों को सुविधाएं मिलेंगी वर्ना रहो इसी हाल में? ये  जो ५०,००० करोड़ जैसा कि मैंने सुना है, अगर सामान्य तरीके से विकास पर खर्च किये जाते तो क्या इस देश की  छवि में ज्यादा सुधार नहीं आता? लेकिन यहाँ तो काम होना है तो पहले तो सर पर तलवार लटकानी होगी कि देखो भैया अंतर्राष्ट्रीय खेलों का मामला है और खेल भी कौन से?, वही जिसमें वो देश ही हिस्सा  लेंगे जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य के गुलाम थे? और हम गर्व से उनका आयोजन करेंगे और भाग लेंगे. आप ही बताइए और कोई ऐसा मंच है जहाँ खेलों में भाग लेने का ये मापदंड हो?"



चूँकि उनकी किसी बात की  काट हमारे पास नहीं थी तो पहले तो हम चुप हो  लिए, फिर हार न मानते हुए अपना पक्ष रखा-" ऐसा सोचना गलत होगा, देश के नौजवानों  को कितना बढावा मिलेगा, बच्चे बच्चे की खेलों में रूचि जाग्रत होगी, जो स्टेडियम बनेंगे वो खिलाड़ियों को कितनी सुविधा देंगे.हो सकता है इन्ही खेलों कि वजह से कोई चैम्पियन हमको भी मिल जाए. और जब अपने एशियाई मुल्क ओलम्पिक तक का आयोजन कर रहे हैं तो हम इतना तो कर ही सकते हैं न." मगर आज तो उनके पास हमारे हर तर्क की  काट मौजूद थी- " खेलों को बढावा? उन रिटायर नेताओं से जो सालों से सभी खेल संघो पर कब्ज़ा जमाये हैं कि बस कैसे भी करके उसको दुहते रहें? वो उनके लिए कामधेनु गाय  के समान हैं भाईसाहब और कुछ नहीं. वरना अब तक कुछ तो दिया होता इस देश को  उन्होंने. खुद तो अपने पैरों पर चल नहीं सकते और खेलों को बढावा देने का नाटक करते हैं. और चैम्पियन ऐसे नहीं मिला करते. कीनिया, कुवैत, ईरान जैसे देशों ने कौन से खेल आयोजित कर लिए जो ओलम्पिक में उनको गोल्ड मेडल मिलना अचम्भा नहीं है पर हमारे लिए है? जहाँ तक स्टेडियमों की बात है, आप देखिएगा बाद में उनका रखरखाव, एक आंसू बहाने वाला भी न मिलेगा.हम सफ़ेद हाथी तो खड़े कर लेते हैं पर ये भूल जाते हैं कि बाद में उनको पालना भी हमको ही  होगा. उसके नाम पर और पैसे की  मांग होगी जो बस उन नेताओं और अधिकारियों की तिजोरियों की शोभा ही बढायेगा,  और आपने एशियाई मुल्कों की मिसाल दी है तो क्या  ये भी याद है आपको कि वो उन सब देशों ने जैसे जापान, कोरिया,चीन ने इन खेलों का आयोजन तब किया जब वो विकास कि दौड़ में बहुत आगे निकल गए और अपने देशों में सभी बुनियादी आवश्यकताओं   की पूर्ति कर ली.साथ ही वो अपनी जमीन पर  पदक तालिका में भी शिखर पर रहे हैं.आपको क्या लगता है? यहाँ इन खेलों में,जो ओलम्पिक की धूल के समान हैं, हम कितने गोल्ड मेडल लेंगे?कौन से स्थान पर रहेंगे? अगर वास्तव में खेलों का भला करना है तो ये सब  शोशेबाजी छोड़कर गाँव गाँव में बुनियादी सुविधाएँ दीजिये, जो खिलाडी हैं उनके पूरे भविष्य की जिम्मेदारी लीजिये फिर देखिये, क्या होता है, पर नहीं यहाँ तो अब सुना है कि २०२४ के ओलम्पिक का दावा पेश किया जाएगा. अच्छा है..घर में नहीं हैं दाने..अम्मा चली भुनाने. खेलों के नाम पर लूट मची है बस."



हम तो आजतक उनके इस बुद्धिजीवी रूप से अपरिचित ही थे तो मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे, फिर माहौल को हल्का करने कि कोशिश में लग लिए, "छोडिये आप भी, काहे की टेंशन ले रहीं हैं, आपको भी तो इसी बहाने खेलों को देखने का मौका मिल रहा है. वरना अब कोई लन्दन तो आप जा नहीं रहीं हैं ओलम्पिक देखने." सुनकर वो भी हंस दीं और बोलीं-"इसीलिए तो आपको तकलीफ देने चली आई हूँ,एक बार तो ये घर फूँक तमाशा देख ही लेते हैं.आप भी चलेंगे? सुनकर हमने तिरछी निग़ाहों से मैडम  की  ओर देखा जो अब तक बड़े सब्र से सारी बहस  सुन रही थीं, और उनके आँखों के भाव पहचान  कर बोले-"नहीं जी, हमको तो ये अपना टीवी ही भला.अब आप चाय पीजिये और टिकट की  चिंता छोडिये."
सुनकर वो मुस्कुरा दीं और कहने लगीं, "चाय शाय तो होती रहेगी, अभी तो बंटू के साथ  बैडमिन्टन खेलने जाना है, अजी शायद २०२४ ओलम्पिक तक देश तो एक और चैम्पियन मिल जाए." सुनकर हम भी हंस दिए और फिर अखबारों में सर गढ़ा कर उनके लिए टिकट ढूँढने में मशगूल हो लिए.

Friday, June 11, 2010

तुम्हारा इंतज़ार.....

इस शब् को फिर से  सुबह का इंतज़ार सा क्यूँ है,
जो तू नहीं तो दिल मेरा बेजार सा क्यूँ है.

मेरी निगाहों से निगाहें चुरा तो  लीं  उसने,
पलकों की जुम्बिश में वो फिर  इकरार सा क्यूँ है.

दामन भी उसका  जो छू ले कोई  भी  नजर,
दिल को मेरे  इतना भी इनकार सा क्यूँ है.

कुछ और जब  कहती थी चेहरे की वो नमी,
फिर उसके कहे से मुझे सरोकार सा क्यूँ है.

जो कांच के टुकड़े भी उठाये  करीने से,
दिल तोड़ने का वो ही  तलबगार सा क्यूँ है.

माथे पे उसके  लट जो  आवारा सी  फिरे  है,
इक दिन  मैं सवारूँगा ये ऐतबार सा क्यूँ है.

दिल का जो अक्स था वो चेहरे  पर न  उतरा ,
तू बन बैठा इतना मगर  होशियार सा क्यूँ है.

तनहा मैं  जब भी आया  आईने के सामने,
चटक के उसका टूटना  हर  बार सा  क्यूँ है.

जो ख़्वाबों में  न आ सको अब तुम मेरे कभी  ,
ये वक़्त इतना तेज़ रफ़्तार सा क्यूँ है.

आज़ाद हुआ इश्क भी अब क़ैद ए वफ़ा  से
जो प्यार था  कभी वो अब व्यापार सा क्यूँ  है.

रास्ता-ए-मुस्तकबिल जो  पा  लिया तुमने,
रुकने को अब कदम ये  बेकरार सा  क्यूँ है.

उल्फत ये खुदा की नहीं तामीर कोई  "नील"
मुहब्बत-ए-नतीजे पर फिर इख्तियार सा क्यूँ है.

Monday, May 31, 2010

रोटी कुछ ऐसी भी..

हर सुबह अपने जमीर से अदावत देखी,
आज फिर रोटी की ये हिमाकत देखी. 

खो गयी है कहीं, खुद्दारी कहते थे जिसे,
हमने अब से रोटी की ये जलालत देखी.

मंदिर मस्जिद में भीड़ तो है, इंसान नहीं,
ज़माना भर में रोटी की ये इबादत देखी.

जो थका जिस्म, बेसुध सोया गाफिल होकर,
रात भर को रोटी की ये मुहब्बत देखी.

दफ़न करके इंसानियत,"इंसान" बन गए हम,
अब तो हर तरफ रोटी की ये वहशत देखी.

खुद के रंजो गम कुछ इस तरह भूले "नील",
वक़्त की दौड़ में रोटी की ये शराफत देखी.