वो एक शनिवार की शाम... फिर कोई मॉल..किसी फिल्म का देखना..
पत्नी की खरीदारी..बच्चों की फरमाइश..
पर इस सबसे पहले ही..
सामने आ गया अनायास वो बच्चा..
कपड़ों के नाम पर थे कुछ चीथडे ..
झुर्रियों से बना मासूम चेहरा..
आखों में आंसू कम और सूनापन ज्यादा..
निराशा से संपन्न सूरत.
एक बचपन जैसा कुछ .. बुढ़ापे की ओर बढता हुआ ..
उस खोमचे के नीचे पड़े झूठे पत्तों में कुछ तलाशता हुआ..
खामखाह आ गया मेरा पास और कह उठा..
बाबूजी ..बहुत भूख लगी है..कुछ मिलेगा क्या..
मन द्रवित हो आया..दिल कचोट गया..
पर जेब में छुट्टा निकला ही नहीं ..
और मैं आ गया अन्दर..चुपचाप..अपनों के पास..
...देखते ही बोले..चलो अब बर्गर खायेंगे....भूख लगी है..
बस ५०० के नोट में आ गए वो और कुछ टाफियां..
सब खुश ..चहकना..खिलखिलाना..पर अचानक वहां हवा विलुप्त होने लगी..
घुटन बढ़ने लगी..जबकि एसी तो था वहां..
लगा जैसे बेहोश हो जाऊँगा..
सो खुली हवा में सांस लेने बाहर आ गया...
पर सामने था फिर वही मंजर..
वही बचपन..वही पत्ते.. वही आँखें..
पैर अनायास ही उधर बढ़ने लगे..
साथ ही उन आँखों में आशा भी ..
मैं भी कह उठा उस खोमचे वाले से..
इसको खिलाना सब जो ये चाहे..
अचानक हवा का तेज झोंका आया..
मौसम सुहाना सा होने लगा...घुटन अब नदारद थी..
अन्दर वो सब खुश थे और अब बाहर मैं भी..
इंसान भी कितना स्वार्थी होता है...
है न??
Sunday, July 25, 2010
Sunday, June 20, 2010
वो जो कहा था..
क्यूँ मैंने कहा था..
गर कह भी दिया था..
तो क्या इतना बड़ा सच था वो..
कि अब उस कहे का गूँज..
सुनाई देती रहेगी..
मेरे तुम्हारे बीच..
हर वक़्त..
हर लम्हा..
मेरे कहने से पहले तो ..
ऐसा न था..
तुम मिलती थीं.. बेपरवाह सी..
वही मासूम हंसी..वही भोलापन..
मैं भी तो हंस लेता था बस तुम्हारे साथ ही..
और उसी एक पल में ..तुम पूछ बैठी थीं..
तुम दोगे न मेरा साथ ...ज़िन्दगी भर???
और मैं अनजान कह बैठा..यही..
फिर ऐसा क्या हुआ कि बस..
तुम मिलती तो हो अब भी..
पर ये हंसी वो नहीं है..
न चेहरे पर अब है मासूमियत..
कुछ डर बचा है
..और थोडा सा..
टूटे हुए विश्वास का सच..
पर मैंने ऐसा भी क्या कह दिया था??..
बस यही तो...
"वक़्त के साथ हालात भी बदलते हैं और ..
इंसान भी.."
गर कह भी दिया था..
तो क्या इतना बड़ा सच था वो..
कि अब उस कहे का गूँज..
सुनाई देती रहेगी..
मेरे तुम्हारे बीच..
हर वक़्त..
हर लम्हा..
मेरे कहने से पहले तो ..
ऐसा न था..
तुम मिलती थीं.. बेपरवाह सी..
वही मासूम हंसी..वही भोलापन..
मैं भी तो हंस लेता था बस तुम्हारे साथ ही..
और उसी एक पल में ..तुम पूछ बैठी थीं..
तुम दोगे न मेरा साथ ...ज़िन्दगी भर???
और मैं अनजान कह बैठा..यही..
फिर ऐसा क्या हुआ कि बस..
तुम मिलती तो हो अब भी..
पर ये हंसी वो नहीं है..
न चेहरे पर अब है मासूमियत..
कुछ डर बचा है
..और थोडा सा..
टूटे हुए विश्वास का सच..
पर मैंने ऐसा भी क्या कह दिया था??..
बस यही तो...
"वक़्त के साथ हालात भी बदलते हैं और ..
इंसान भी.."
Monday, June 14, 2010
घर फूँक तमाशा
उस दिन रविवार था सो हम घर पर ही विराजमान थे.बस पलंग पर कब्ज़ा जमाकर दो तीन अखबार और एक टीवी से काम चला रहे थे. बीच बीच में जब भी मन होता,मैडम को आवाज लगा कुछ भी मंगवाए जा रहे थे, खाए जा रहे थे और उनकी जहरीली नजरों से बेपरवाह, बेशर्म होकर सन्डे मना रहे थे कि अचानक सिम्मी जी का आगमन हो गया.सिम्मी जी...यानी सिमरन चड्ढा, हमारे महल्ले की एकमात्र संजीवनी, कम से कम महल्ले के हर पुरूष का तो यही मानना है, अब वो चाहे इसको अपनी बीवी के डर से कहे या न कहे. हाँ बस एक गुरिंदर जी इस मत से सहमत नहीं थे. कारण??उनके पति जो ठहरे. ५ साल के बेटे बंटू की मम्मी हैं लेकिन कोई मानता ही नहीं,खासकर हम सब भले मानुष.
हमारे घर से कुछ विशेष प्रेम है उनको,प्रेम तो हमको भी है लेकिन मैडम से बचकर ही, खैर तो बात उनके आने की हो रही थी..आते ही जैसे ही हमको देखकर बोलीं " क्या भाईसाहब, आप यहाँ क्या कर रहे हो??.उधर वो भी अकेले बैठें हैं..उनको ज्वाइन करो न, मैं हूँ इधर." उनके मुहं से भाईसाहब सुनते ही हमारा सारा मूड ही चौपट हो गया और हमने भी कह दिया " अजी क्यूँ उनको परेशान करना, आप यहाँ हैं तो वो वहां चैन से हैं न."...हमारे कहे को सुन कर भी अनसुना कर दिया उन्होंने और बिंदास होकर हमारी जागीर यानी कि पलंग के एक कोने पर कब्ज़ा जमाकर बैठ गयीं.तभी हमारी मैडम भी आ गयीं, वैसे भी सही जगह पर गलत वक़्त पहुँचने का रोग संसार की हर पत्नी को होता है ..सो हमने भी दिल पर पत्थर रख लिया और पूछ बैठे- कहिये सिम्मी जी, आज क्या मसला है जो सन्डे के दिन गुरिंदर जी को छोड़ कर आयीं हैं??.कोई ख़ास बात??..सुनते ही तपाक से बोलीं"ये बताइए भाईसाहब कि कॉमनवेल्थ गेम्स के टिकट कहाँ से मिलेंगे?? हमारे उनको तो जरा भी इंटेरेस्ट नहीं है."सुनकर हमने कहा-अरे इसमें क्या है सिम्मी जी,वो तो आप कहीं से भी ले सकती हैं न, कहें तो हम लाकर दे देंगे.
इतना सुनते ही मैडम जल कर बोलीं- " हाँ, क्यूँ नहीं, तुमने कहा है तो टिकट कल ही ला देंगे,वैसे मैं इनको सुबह एक ब्रेड भी लाने को बोलूं तो पैरों में सारा दर्द उसी वक़्त आ जाता है. गाँधी जी बातों पर अमल करते हुए यानी "बुरा मत सुनो" के तर्ज पर हमने अपनी मैडम कि बात को अनसुना किया और सिम्मी जी से पूछ बैठे- पर आपकी इन खेलों में रुचि कहाँ से जाग गयी?? आज तक तो कभी देखा नहीं हमने आपको कोई खेल देखते हुए. आप तो बस अपने स्कूल और कम्पयूटर में ही बिज़ी रहती हैं. दरअसल सिम्मी जी एक सरकारी स्कूल में कम्पयूटर शिक्षिका हैं. सुनकर सिम्मी जी तीखे स्वर में बोलीं-खेल जाएँ भाड़ में जी, मुझको तो बस ये देखना है कि इतने वर्षों से महज दस दिन के हंगामे पर जो घर फूँक तमाशा किया जा रहा है वो आखिर है क्या??
सुनकर हम अचंभित हो गए और कहा-" अरे ऐसा क्यूँ बोल रहीं है आप? ऐसे आयोजनों से देश का नाम होता है, विश्व में हमारी एक पहचान स्थापित होती है. हम भी दुनिया को बता सकते हैं कि हमारा देश भी ऐसे आयोजनों को आसानी से कर सकता है." सुनकर व्यंग भरे अंदाज में बोलीं वो-" वाह भाईसाहब वाह ! दस दिन के नाटक से हमारे देश का नाम रोशन हो जाएगा, वो नाम जो करोड़ों बच्चों कि बेवक्त मौत, अशिक्षा, कुपोषण, भ्रष्टाचार जैसे न जाने कितने मुद्दों से दागदार है, उसको ये खेल धो देंगे. ऐसा सोचना भी खूब है. मान गए आपको." सुनकर हम सिटपिटा गए और बचाव कि मुद्रा में आकर बोले-" ऐसा कैसे कह सकती हैं आप?? देखिये दिल्ली वासियों का इस खेलों के बहाने कितना भला हो रहा है, आपको मालूम है वहां २६ फ्लाईओवर, १८ रेलवे पुल, मेट्रो का विस्तार, सड़कों का चौडीकरण , एक पूरा खेल गाँव और पता नहीं क्या क्या काम हो रहे हैं.कम से कम देश की राजधानी तो संवर जायेगी, ऐसे ही सोच लीजिये." ये सुनकर तो उनका गुस्सा और भड़क गया -" हद है यानी कि, हमारे देश में जो भी जरूरी काम होना है उसके लिए इन बहानों की जरुरत होती है. ये चीज़ें क्या इसलिए पहले ही नहीं बन जानी चाहिए थीं कि दिल्ली को उनकी जरुरत है? यानी कि खेल होंगे तभी दिल्लीवासियों को सुविधाएं मिलेंगी वर्ना रहो इसी हाल में? ये जो ५०,००० करोड़ जैसा कि मैंने सुना है, अगर सामान्य तरीके से विकास पर खर्च किये जाते तो क्या इस देश की छवि में ज्यादा सुधार नहीं आता? लेकिन यहाँ तो काम होना है तो पहले तो सर पर तलवार लटकानी होगी कि देखो भैया अंतर्राष्ट्रीय खेलों का मामला है और खेल भी कौन से?, वही जिसमें वो देश ही हिस्सा लेंगे जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य के गुलाम थे? और हम गर्व से उनका आयोजन करेंगे और भाग लेंगे. आप ही बताइए और कोई ऐसा मंच है जहाँ खेलों में भाग लेने का ये मापदंड हो?"
चूँकि उनकी किसी बात की काट हमारे पास नहीं थी तो पहले तो हम चुप हो लिए, फिर हार न मानते हुए अपना पक्ष रखा-" ऐसा सोचना गलत होगा, देश के नौजवानों को कितना बढावा मिलेगा, बच्चे बच्चे की खेलों में रूचि जाग्रत होगी, जो स्टेडियम बनेंगे वो खिलाड़ियों को कितनी सुविधा देंगे.हो सकता है इन्ही खेलों कि वजह से कोई चैम्पियन हमको भी मिल जाए. और जब अपने एशियाई मुल्क ओलम्पिक तक का आयोजन कर रहे हैं तो हम इतना तो कर ही सकते हैं न." मगर आज तो उनके पास हमारे हर तर्क की काट मौजूद थी- " खेलों को बढावा? उन रिटायर नेताओं से जो सालों से सभी खेल संघो पर कब्ज़ा जमाये हैं कि बस कैसे भी करके उसको दुहते रहें? वो उनके लिए कामधेनु गाय के समान हैं भाईसाहब और कुछ नहीं. वरना अब तक कुछ तो दिया होता इस देश को उन्होंने. खुद तो अपने पैरों पर चल नहीं सकते और खेलों को बढावा देने का नाटक करते हैं. और चैम्पियन ऐसे नहीं मिला करते. कीनिया, कुवैत, ईरान जैसे देशों ने कौन से खेल आयोजित कर लिए जो ओलम्पिक में उनको गोल्ड मेडल मिलना अचम्भा नहीं है पर हमारे लिए है? जहाँ तक स्टेडियमों की बात है, आप देखिएगा बाद में उनका रखरखाव, एक आंसू बहाने वाला भी न मिलेगा.हम सफ़ेद हाथी तो खड़े कर लेते हैं पर ये भूल जाते हैं कि बाद में उनको पालना भी हमको ही होगा. उसके नाम पर और पैसे की मांग होगी जो बस उन नेताओं और अधिकारियों की तिजोरियों की शोभा ही बढायेगा, और आपने एशियाई मुल्कों की मिसाल दी है तो क्या ये भी याद है आपको कि वो उन सब देशों ने जैसे जापान, कोरिया,चीन ने इन खेलों का आयोजन तब किया जब वो विकास कि दौड़ में बहुत आगे निकल गए और अपने देशों में सभी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति कर ली.साथ ही वो अपनी जमीन पर पदक तालिका में भी शिखर पर रहे हैं.आपको क्या लगता है? यहाँ इन खेलों में,जो ओलम्पिक की धूल के समान हैं, हम कितने गोल्ड मेडल लेंगे?कौन से स्थान पर रहेंगे? अगर वास्तव में खेलों का भला करना है तो ये सब शोशेबाजी छोड़कर गाँव गाँव में बुनियादी सुविधाएँ दीजिये, जो खिलाडी हैं उनके पूरे भविष्य की जिम्मेदारी लीजिये फिर देखिये, क्या होता है, पर नहीं यहाँ तो अब सुना है कि २०२४ के ओलम्पिक का दावा पेश किया जाएगा. अच्छा है..घर में नहीं हैं दाने..अम्मा चली भुनाने. खेलों के नाम पर लूट मची है बस."
हम तो आजतक उनके इस बुद्धिजीवी रूप से अपरिचित ही थे तो मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे, फिर माहौल को हल्का करने कि कोशिश में लग लिए, "छोडिये आप भी, काहे की टेंशन ले रहीं हैं, आपको भी तो इसी बहाने खेलों को देखने का मौका मिल रहा है. वरना अब कोई लन्दन तो आप जा नहीं रहीं हैं ओलम्पिक देखने." सुनकर वो भी हंस दीं और बोलीं-"इसीलिए तो आपको तकलीफ देने चली आई हूँ,एक बार तो ये घर फूँक तमाशा देख ही लेते हैं.आप भी चलेंगे? सुनकर हमने तिरछी निग़ाहों से मैडम की ओर देखा जो अब तक बड़े सब्र से सारी बहस सुन रही थीं, और उनके आँखों के भाव पहचान कर बोले-"नहीं जी, हमको तो ये अपना टीवी ही भला.अब आप चाय पीजिये और टिकट की चिंता छोडिये."
सुनकर वो मुस्कुरा दीं और कहने लगीं, "चाय शाय तो होती रहेगी, अभी तो बंटू के साथ बैडमिन्टन खेलने जाना है, अजी शायद २०२४ ओलम्पिक तक देश तो एक और चैम्पियन मिल जाए." सुनकर हम भी हंस दिए और फिर अखबारों में सर गढ़ा कर उनके लिए टिकट ढूँढने में मशगूल हो लिए.
हमारे घर से कुछ विशेष प्रेम है उनको,प्रेम तो हमको भी है लेकिन मैडम से बचकर ही, खैर तो बात उनके आने की हो रही थी..आते ही जैसे ही हमको देखकर बोलीं " क्या भाईसाहब, आप यहाँ क्या कर रहे हो??.उधर वो भी अकेले बैठें हैं..उनको ज्वाइन करो न, मैं हूँ इधर." उनके मुहं से भाईसाहब सुनते ही हमारा सारा मूड ही चौपट हो गया और हमने भी कह दिया " अजी क्यूँ उनको परेशान करना, आप यहाँ हैं तो वो वहां चैन से हैं न."...हमारे कहे को सुन कर भी अनसुना कर दिया उन्होंने और बिंदास होकर हमारी जागीर यानी कि पलंग के एक कोने पर कब्ज़ा जमाकर बैठ गयीं.तभी हमारी मैडम भी आ गयीं, वैसे भी सही जगह पर गलत वक़्त पहुँचने का रोग संसार की हर पत्नी को होता है ..सो हमने भी दिल पर पत्थर रख लिया और पूछ बैठे- कहिये सिम्मी जी, आज क्या मसला है जो सन्डे के दिन गुरिंदर जी को छोड़ कर आयीं हैं??.कोई ख़ास बात??..सुनते ही तपाक से बोलीं"ये बताइए भाईसाहब कि कॉमनवेल्थ गेम्स के टिकट कहाँ से मिलेंगे?? हमारे उनको तो जरा भी इंटेरेस्ट नहीं है."सुनकर हमने कहा-अरे इसमें क्या है सिम्मी जी,वो तो आप कहीं से भी ले सकती हैं न, कहें तो हम लाकर दे देंगे.
इतना सुनते ही मैडम जल कर बोलीं- " हाँ, क्यूँ नहीं, तुमने कहा है तो टिकट कल ही ला देंगे,वैसे मैं इनको सुबह एक ब्रेड भी लाने को बोलूं तो पैरों में सारा दर्द उसी वक़्त आ जाता है. गाँधी जी बातों पर अमल करते हुए यानी "बुरा मत सुनो" के तर्ज पर हमने अपनी मैडम कि बात को अनसुना किया और सिम्मी जी से पूछ बैठे- पर आपकी इन खेलों में रुचि कहाँ से जाग गयी?? आज तक तो कभी देखा नहीं हमने आपको कोई खेल देखते हुए. आप तो बस अपने स्कूल और कम्पयूटर में ही बिज़ी रहती हैं. दरअसल सिम्मी जी एक सरकारी स्कूल में कम्पयूटर शिक्षिका हैं. सुनकर सिम्मी जी तीखे स्वर में बोलीं-खेल जाएँ भाड़ में जी, मुझको तो बस ये देखना है कि इतने वर्षों से महज दस दिन के हंगामे पर जो घर फूँक तमाशा किया जा रहा है वो आखिर है क्या??
सुनकर हम अचंभित हो गए और कहा-" अरे ऐसा क्यूँ बोल रहीं है आप? ऐसे आयोजनों से देश का नाम होता है, विश्व में हमारी एक पहचान स्थापित होती है. हम भी दुनिया को बता सकते हैं कि हमारा देश भी ऐसे आयोजनों को आसानी से कर सकता है." सुनकर व्यंग भरे अंदाज में बोलीं वो-" वाह भाईसाहब वाह ! दस दिन के नाटक से हमारे देश का नाम रोशन हो जाएगा, वो नाम जो करोड़ों बच्चों कि बेवक्त मौत, अशिक्षा, कुपोषण, भ्रष्टाचार जैसे न जाने कितने मुद्दों से दागदार है, उसको ये खेल धो देंगे. ऐसा सोचना भी खूब है. मान गए आपको." सुनकर हम सिटपिटा गए और बचाव कि मुद्रा में आकर बोले-" ऐसा कैसे कह सकती हैं आप?? देखिये दिल्ली वासियों का इस खेलों के बहाने कितना भला हो रहा है, आपको मालूम है वहां २६ फ्लाईओवर, १८ रेलवे पुल, मेट्रो का विस्तार, सड़कों का चौडीकरण , एक पूरा खेल गाँव और पता नहीं क्या क्या काम हो रहे हैं.कम से कम देश की राजधानी तो संवर जायेगी, ऐसे ही सोच लीजिये." ये सुनकर तो उनका गुस्सा और भड़क गया -" हद है यानी कि, हमारे देश में जो भी जरूरी काम होना है उसके लिए इन बहानों की जरुरत होती है. ये चीज़ें क्या इसलिए पहले ही नहीं बन जानी चाहिए थीं कि दिल्ली को उनकी जरुरत है? यानी कि खेल होंगे तभी दिल्लीवासियों को सुविधाएं मिलेंगी वर्ना रहो इसी हाल में? ये जो ५०,००० करोड़ जैसा कि मैंने सुना है, अगर सामान्य तरीके से विकास पर खर्च किये जाते तो क्या इस देश की छवि में ज्यादा सुधार नहीं आता? लेकिन यहाँ तो काम होना है तो पहले तो सर पर तलवार लटकानी होगी कि देखो भैया अंतर्राष्ट्रीय खेलों का मामला है और खेल भी कौन से?, वही जिसमें वो देश ही हिस्सा लेंगे जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य के गुलाम थे? और हम गर्व से उनका आयोजन करेंगे और भाग लेंगे. आप ही बताइए और कोई ऐसा मंच है जहाँ खेलों में भाग लेने का ये मापदंड हो?"
चूँकि उनकी किसी बात की काट हमारे पास नहीं थी तो पहले तो हम चुप हो लिए, फिर हार न मानते हुए अपना पक्ष रखा-" ऐसा सोचना गलत होगा, देश के नौजवानों को कितना बढावा मिलेगा, बच्चे बच्चे की खेलों में रूचि जाग्रत होगी, जो स्टेडियम बनेंगे वो खिलाड़ियों को कितनी सुविधा देंगे.हो सकता है इन्ही खेलों कि वजह से कोई चैम्पियन हमको भी मिल जाए. और जब अपने एशियाई मुल्क ओलम्पिक तक का आयोजन कर रहे हैं तो हम इतना तो कर ही सकते हैं न." मगर आज तो उनके पास हमारे हर तर्क की काट मौजूद थी- " खेलों को बढावा? उन रिटायर नेताओं से जो सालों से सभी खेल संघो पर कब्ज़ा जमाये हैं कि बस कैसे भी करके उसको दुहते रहें? वो उनके लिए कामधेनु गाय के समान हैं भाईसाहब और कुछ नहीं. वरना अब तक कुछ तो दिया होता इस देश को उन्होंने. खुद तो अपने पैरों पर चल नहीं सकते और खेलों को बढावा देने का नाटक करते हैं. और चैम्पियन ऐसे नहीं मिला करते. कीनिया, कुवैत, ईरान जैसे देशों ने कौन से खेल आयोजित कर लिए जो ओलम्पिक में उनको गोल्ड मेडल मिलना अचम्भा नहीं है पर हमारे लिए है? जहाँ तक स्टेडियमों की बात है, आप देखिएगा बाद में उनका रखरखाव, एक आंसू बहाने वाला भी न मिलेगा.हम सफ़ेद हाथी तो खड़े कर लेते हैं पर ये भूल जाते हैं कि बाद में उनको पालना भी हमको ही होगा. उसके नाम पर और पैसे की मांग होगी जो बस उन नेताओं और अधिकारियों की तिजोरियों की शोभा ही बढायेगा, और आपने एशियाई मुल्कों की मिसाल दी है तो क्या ये भी याद है आपको कि वो उन सब देशों ने जैसे जापान, कोरिया,चीन ने इन खेलों का आयोजन तब किया जब वो विकास कि दौड़ में बहुत आगे निकल गए और अपने देशों में सभी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति कर ली.साथ ही वो अपनी जमीन पर पदक तालिका में भी शिखर पर रहे हैं.आपको क्या लगता है? यहाँ इन खेलों में,जो ओलम्पिक की धूल के समान हैं, हम कितने गोल्ड मेडल लेंगे?कौन से स्थान पर रहेंगे? अगर वास्तव में खेलों का भला करना है तो ये सब शोशेबाजी छोड़कर गाँव गाँव में बुनियादी सुविधाएँ दीजिये, जो खिलाडी हैं उनके पूरे भविष्य की जिम्मेदारी लीजिये फिर देखिये, क्या होता है, पर नहीं यहाँ तो अब सुना है कि २०२४ के ओलम्पिक का दावा पेश किया जाएगा. अच्छा है..घर में नहीं हैं दाने..अम्मा चली भुनाने. खेलों के नाम पर लूट मची है बस."
हम तो आजतक उनके इस बुद्धिजीवी रूप से अपरिचित ही थे तो मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे, फिर माहौल को हल्का करने कि कोशिश में लग लिए, "छोडिये आप भी, काहे की टेंशन ले रहीं हैं, आपको भी तो इसी बहाने खेलों को देखने का मौका मिल रहा है. वरना अब कोई लन्दन तो आप जा नहीं रहीं हैं ओलम्पिक देखने." सुनकर वो भी हंस दीं और बोलीं-"इसीलिए तो आपको तकलीफ देने चली आई हूँ,एक बार तो ये घर फूँक तमाशा देख ही लेते हैं.आप भी चलेंगे? सुनकर हमने तिरछी निग़ाहों से मैडम की ओर देखा जो अब तक बड़े सब्र से सारी बहस सुन रही थीं, और उनके आँखों के भाव पहचान कर बोले-"नहीं जी, हमको तो ये अपना टीवी ही भला.अब आप चाय पीजिये और टिकट की चिंता छोडिये."
सुनकर वो मुस्कुरा दीं और कहने लगीं, "चाय शाय तो होती रहेगी, अभी तो बंटू के साथ बैडमिन्टन खेलने जाना है, अजी शायद २०२४ ओलम्पिक तक देश तो एक और चैम्पियन मिल जाए." सुनकर हम भी हंस दिए और फिर अखबारों में सर गढ़ा कर उनके लिए टिकट ढूँढने में मशगूल हो लिए.
Friday, June 11, 2010
तुम्हारा इंतज़ार.....
इस शब् को फिर से सुबह का इंतज़ार सा क्यूँ है,
जो तू नहीं तो दिल मेरा बेजार सा क्यूँ है.
मेरी निगाहों से निगाहें चुरा तो लीं उसने,
पलकों की जुम्बिश में वो फिर इकरार सा क्यूँ है.
दामन भी उसका जो छू ले कोई भी नजर,
दिल को मेरे इतना भी इनकार सा क्यूँ है.
कुछ और जब कहती थी चेहरे की वो नमी,
फिर उसके कहे से मुझे सरोकार सा क्यूँ है.
जो कांच के टुकड़े भी उठाये करीने से,
दिल तोड़ने का वो ही तलबगार सा क्यूँ है.
माथे पे उसके लट जो आवारा सी फिरे है,
इक दिन मैं सवारूँगा ये ऐतबार सा क्यूँ है.
दिल का जो अक्स था वो चेहरे पर न उतरा ,
तू बन बैठा इतना मगर होशियार सा क्यूँ है.
तनहा मैं जब भी आया आईने के सामने,
चटक के उसका टूटना हर बार सा क्यूँ है.
जो ख़्वाबों में न आ सको अब तुम मेरे कभी ,
ये वक़्त इतना तेज़ रफ़्तार सा क्यूँ है.
आज़ाद हुआ इश्क भी अब क़ैद ए वफ़ा से
जो प्यार था कभी वो अब व्यापार सा क्यूँ है.
रास्ता-ए-मुस्तकबिल जो पा लिया तुमने,
रुकने को अब कदम ये बेकरार सा क्यूँ है.
उल्फत ये खुदा की नहीं तामीर कोई "नील"
मुहब्बत-ए-नतीजे पर फिर इख्तियार सा क्यूँ है.
जो तू नहीं तो दिल मेरा बेजार सा क्यूँ है.
मेरी निगाहों से निगाहें चुरा तो लीं उसने,
पलकों की जुम्बिश में वो फिर इकरार सा क्यूँ है.
दामन भी उसका जो छू ले कोई भी नजर,
दिल को मेरे इतना भी इनकार सा क्यूँ है.
कुछ और जब कहती थी चेहरे की वो नमी,
फिर उसके कहे से मुझे सरोकार सा क्यूँ है.
जो कांच के टुकड़े भी उठाये करीने से,
दिल तोड़ने का वो ही तलबगार सा क्यूँ है.
माथे पे उसके लट जो आवारा सी फिरे है,
इक दिन मैं सवारूँगा ये ऐतबार सा क्यूँ है.
दिल का जो अक्स था वो चेहरे पर न उतरा ,
तू बन बैठा इतना मगर होशियार सा क्यूँ है.
तनहा मैं जब भी आया आईने के सामने,
चटक के उसका टूटना हर बार सा क्यूँ है.
जो ख़्वाबों में न आ सको अब तुम मेरे कभी ,
ये वक़्त इतना तेज़ रफ़्तार सा क्यूँ है.
आज़ाद हुआ इश्क भी अब क़ैद ए वफ़ा से
जो प्यार था कभी वो अब व्यापार सा क्यूँ है.
रास्ता-ए-मुस्तकबिल जो पा लिया तुमने,
रुकने को अब कदम ये बेकरार सा क्यूँ है.
उल्फत ये खुदा की नहीं तामीर कोई "नील"
मुहब्बत-ए-नतीजे पर फिर इख्तियार सा क्यूँ है.
Monday, May 31, 2010
रोटी कुछ ऐसी भी..
हर सुबह अपने जमीर से अदावत देखी,
आज फिर रोटी की ये हिमाकत देखी.
खो गयी है कहीं, खुद्दारी कहते थे जिसे,
हमने अब से रोटी की ये जलालत देखी.
मंदिर मस्जिद में भीड़ तो है, इंसान नहीं,
ज़माना भर में रोटी की ये इबादत देखी.
जो थका जिस्म, बेसुध सोया गाफिल होकर,
रात भर को रोटी की ये मुहब्बत देखी.
दफ़न करके इंसानियत,"इंसान" बन गए हम,
अब तो हर तरफ रोटी की ये वहशत देखी.
खुद के रंजो गम कुछ इस तरह भूले "नील",
वक़्त की दौड़ में रोटी की ये शराफत देखी.
आज फिर रोटी की ये हिमाकत देखी.
खो गयी है कहीं, खुद्दारी कहते थे जिसे,
हमने अब से रोटी की ये जलालत देखी.
मंदिर मस्जिद में भीड़ तो है, इंसान नहीं,
ज़माना भर में रोटी की ये इबादत देखी.
जो थका जिस्म, बेसुध सोया गाफिल होकर,
रात भर को रोटी की ये मुहब्बत देखी.
दफ़न करके इंसानियत,"इंसान" बन गए हम,
अब तो हर तरफ रोटी की ये वहशत देखी.
खुद के रंजो गम कुछ इस तरह भूले "नील",
वक़्त की दौड़ में रोटी की ये शराफत देखी.
Friday, April 2, 2010
तू धरा है या
जननी है मेरी,
मैं तेरा ऋणी
शिशु सा कहीं.
तू ही शाश्वत
मैं हूँ नश्वर,
तू जीवन दायिनी
हो जैसे ईश्वर.
तेरी ही अंजुरी
से मिला है अमृत,
ये मनुष्य जीवन
तुझे ही अर्पण.
रवि का तेज
शशि सी शीतल,
अग्नि सी दहके
है नीर सी निर्मल.
ममता बिखराए
तो स्वर्ग है तू,
जो बिखर गयी
तो नर्क भी तू.
वो हिन्दू ये मुस्लिम
ये पूर्व वो पश्चिम,
सभी को वरदान तेरा
मिले आसमान तेरा.
कहीं ओस की निर्मल बूँद
या लावा हो तप्त कहीं,
तू दोनों का भार उठाये
शांत भी है निर्लिप्त कहीं.
तेरी ही कोख में
पले हर जीवन,
हर एक पुष्प का
तू ही है मधुवन.
हम तेरे उपासक
तू ही है सिद्धि,
अब क्या मैं मांगू
तू ही है रिद्धि.
प्रदत्त करूँ ये ऋण
कहे अनुरागी मन,
तब मुक्ति मिले मुझे
होम हो यह तन.
तू धरा है या
जननी है मेरी,
में तेरा ऋणी
शिशु सा कहीं...
जननी है मेरी,
मैं तेरा ऋणी
शिशु सा कहीं.
तू ही शाश्वत
मैं हूँ नश्वर,
तू जीवन दायिनी
हो जैसे ईश्वर.
तेरी ही अंजुरी
से मिला है अमृत,
ये मनुष्य जीवन
तुझे ही अर्पण.
रवि का तेज
शशि सी शीतल,
अग्नि सी दहके
है नीर सी निर्मल.
ममता बिखराए
तो स्वर्ग है तू,
जो बिखर गयी
तो नर्क भी तू.
वो हिन्दू ये मुस्लिम
ये पूर्व वो पश्चिम,
सभी को वरदान तेरा
मिले आसमान तेरा.
कहीं ओस की निर्मल बूँद
या लावा हो तप्त कहीं,
तू दोनों का भार उठाये
शांत भी है निर्लिप्त कहीं.
तेरी ही कोख में
पले हर जीवन,
हर एक पुष्प का
तू ही है मधुवन.
हम तेरे उपासक
तू ही है सिद्धि,
अब क्या मैं मांगू
तू ही है रिद्धि.
प्रदत्त करूँ ये ऋण
कहे अनुरागी मन,
तब मुक्ति मिले मुझे
होम हो यह तन.
तू धरा है या
जननी है मेरी,
में तेरा ऋणी
शिशु सा कहीं...
Friday, March 19, 2010
चलते चलते
दुनिया ने जो भी दिया कभी ऐसे ही न लौटाना,
तुम बनो धरती या फिर एक सीप हो जाना.
गर खुदगर्ज होते सब तो ये दुनिया ही न होती,
तू कोयले को हीरा कर या बूँद को बना दे मोती.
तुम बनो धरती या फिर एक सीप हो जाना.
गर खुदगर्ज होते सब तो ये दुनिया ही न होती,
तू कोयले को हीरा कर या बूँद को बना दे मोती.
Wednesday, March 17, 2010
किस्सा एक मुठभेड़ का
सुबह जों ही मैं घर के दरवाजे पर आया
एक अजनबी को अपने सामने खड़ा पाया,
आते ही अतिथि देवो भव: को सिद्ध किया
और बिन कहे ही हमारे पलंग पर बैठ गया,
पहले तो हम शरीफ इंसान की तरह डर गए
फिर हिम्मत बाँधी और उस पर चढ़ गए,
शर्म नहीं आती जो ऐसे घुसे चले आते हो
कौन हो तुम और किससे मिलना चाहते हो,
वो हंस कर बोला तुमसे ही काम है
मिलना था जरूरी और गम मेरा नाम है,
तुमसे एक शिकायत है बरसों पुरानी
अपना नहीं समझते करते हो नादानी,
जब भी किसी बहाने से चला आता हूँ
तुम्हारे दिल में जगह कभी नहीं पाता हूँ,
हमेशा जिन्दादिली को अपना लेते हो
तुम इंसान होकर मुझको दगा देते हो,
मेरे साथ रहोगे तो सही अर्थों में कवि बन पाओगे
वरना गहरे में नहीं बस ऊपर से ही निकल जाओगे,
जब भी तुम्हारे साथ रहने की सोची है,
तुमने झटक दिया मुझे तकलीफ बड़ी होती है,
तुम क्यूँ हर दुःख तो अपना बना लेते हो
हर हाल में भी कैसे मुस्कुरा लेते हो,
मैं रहूँगा तो इंसानी रिश्तों को समझोगे
कौन अपना कौन बेगाना इस हकीकत को समझोगे,
दुनिया में सभी जन मेरे बन्धु मेरे सगे हैं
फिर तुम में कौन से सुरखाब के पर लगे हैं,
आज तो बस मन में यही ठान कर आया हूँ
तुम जतन लाख करो मैं अपना बनाने आया हूँ,
मैंने हंस कर कहा दोस्त तुम गलत जगह आ गए हो
यहाँ तुम्हारी कद्र नहीं तुम पता गलत पा गए हो,
ज़िन्दगी तुम बिन गुजारना ही मेरा मकसद है
ज़िन्दगी हमनवा मेरी ख़ुशी ही मेरी उल्फत है,
मुझे खुद को अब तुझसे दूर ही रखना है
क़यामत के दिन खुदा को जवाब भी तो देना है,
नामी कवि बन जाने की यह कीमत नहीं दे पाऊंगा
मैं ऊपर ही मजे में हूँ गहरे में शायद डूब जाऊँगा,
चल आ आज तुझे तेरी औकात बताता हूँ
अपने जीवन में तुझे तेरी जगह दिखाता हूँ,
मन के पिछवाड़े एक छोटी अँधेरी कोठरी पर उसे ले गया
जहाँ अपना भयानक प्रतिबिम्ब देख गम तो डर गया,
हंस कर कहा मैंने अब क्यों खड़े हो आँखों को मींचे
आखिर आ ही गया न आज ऊँट पहाड़ के नीचे,
अहमियत ख़ुशी की बनी रहे सो तुझे सह लेता हूँ
इसी वजह से कभी कभी मैं रोटी पानी दे देता हूँ,
मेरी इस कोठरी तक किसी की भी पहुँच नहीं
तू रहता है साथ यहाँ किसी को खबर तक नहीं,
सुनकर गम का चेहरा तो उतर गया
यह क्या वो तो खुद ग़मगीन हो गया,
बोला तुझसे सर टकराना वक़्त जाया करना है
मुझको नहीं इस काल कोठरी में रहना है,
अब आ गया हूँ तो खाली हाथ तो न जाऊँगा
मुझको किसी सुखी का पता दे मैं वहीँ बस जाऊँगा,
सुनकर हमारे दिमाग का शैतानी घोड़ा दौड़ गया
मन के एक कोने में अपने पड़ोसी का पता छोड़ गया,
जो हमसे कहीं ज्यादा गुणी, धनिक और खुशहाल था
हमारे महल्ले में कहो तो लोकप्रियता की एक मिसाल था,
तो हमने गम को अपने पड़ोसी का पता बता दिया
और इस तरह अपना पड़ोसी धर्म निभा दिया.
एक अजनबी को अपने सामने खड़ा पाया,
आते ही अतिथि देवो भव: को सिद्ध किया
और बिन कहे ही हमारे पलंग पर बैठ गया,
पहले तो हम शरीफ इंसान की तरह डर गए
फिर हिम्मत बाँधी और उस पर चढ़ गए,
शर्म नहीं आती जो ऐसे घुसे चले आते हो
कौन हो तुम और किससे मिलना चाहते हो,
वो हंस कर बोला तुमसे ही काम है
मिलना था जरूरी और गम मेरा नाम है,
तुमसे एक शिकायत है बरसों पुरानी
अपना नहीं समझते करते हो नादानी,
जब भी किसी बहाने से चला आता हूँ
तुम्हारे दिल में जगह कभी नहीं पाता हूँ,
हमेशा जिन्दादिली को अपना लेते हो
तुम इंसान होकर मुझको दगा देते हो,
मेरे साथ रहोगे तो सही अर्थों में कवि बन पाओगे
वरना गहरे में नहीं बस ऊपर से ही निकल जाओगे,
जब भी तुम्हारे साथ रहने की सोची है,
तुमने झटक दिया मुझे तकलीफ बड़ी होती है,
तुम क्यूँ हर दुःख तो अपना बना लेते हो
हर हाल में भी कैसे मुस्कुरा लेते हो,
मैं रहूँगा तो इंसानी रिश्तों को समझोगे
कौन अपना कौन बेगाना इस हकीकत को समझोगे,
दुनिया में सभी जन मेरे बन्धु मेरे सगे हैं
फिर तुम में कौन से सुरखाब के पर लगे हैं,
आज तो बस मन में यही ठान कर आया हूँ
तुम जतन लाख करो मैं अपना बनाने आया हूँ,
मैंने हंस कर कहा दोस्त तुम गलत जगह आ गए हो
यहाँ तुम्हारी कद्र नहीं तुम पता गलत पा गए हो,
ज़िन्दगी तुम बिन गुजारना ही मेरा मकसद है
ज़िन्दगी हमनवा मेरी ख़ुशी ही मेरी उल्फत है,
मुझे खुद को अब तुझसे दूर ही रखना है
क़यामत के दिन खुदा को जवाब भी तो देना है,
नामी कवि बन जाने की यह कीमत नहीं दे पाऊंगा
मैं ऊपर ही मजे में हूँ गहरे में शायद डूब जाऊँगा,
चल आ आज तुझे तेरी औकात बताता हूँ
अपने जीवन में तुझे तेरी जगह दिखाता हूँ,
मन के पिछवाड़े एक छोटी अँधेरी कोठरी पर उसे ले गया
जहाँ अपना भयानक प्रतिबिम्ब देख गम तो डर गया,
हंस कर कहा मैंने अब क्यों खड़े हो आँखों को मींचे
आखिर आ ही गया न आज ऊँट पहाड़ के नीचे,
अहमियत ख़ुशी की बनी रहे सो तुझे सह लेता हूँ
इसी वजह से कभी कभी मैं रोटी पानी दे देता हूँ,
मेरी इस कोठरी तक किसी की भी पहुँच नहीं
तू रहता है साथ यहाँ किसी को खबर तक नहीं,
सुनकर गम का चेहरा तो उतर गया
यह क्या वो तो खुद ग़मगीन हो गया,
बोला तुझसे सर टकराना वक़्त जाया करना है
मुझको नहीं इस काल कोठरी में रहना है,
अब आ गया हूँ तो खाली हाथ तो न जाऊँगा
मुझको किसी सुखी का पता दे मैं वहीँ बस जाऊँगा,
सुनकर हमारे दिमाग का शैतानी घोड़ा दौड़ गया
मन के एक कोने में अपने पड़ोसी का पता छोड़ गया,
जो हमसे कहीं ज्यादा गुणी, धनिक और खुशहाल था
हमारे महल्ले में कहो तो लोकप्रियता की एक मिसाल था,
तो हमने गम को अपने पड़ोसी का पता बता दिया
और इस तरह अपना पड़ोसी धर्म निभा दिया.
Saturday, March 6, 2010
अधूरे काम
ज़िन्दगी में जो पल छूट गए
एक बार फिर से पाने हैं
तुम राह न देखना मेरी अभी
कुछ अधूरे काम निपटाने हैं.
इतने दिन जो चले साथ तेरे
मन की हर इक राह पर
वो राह भी खो गयी कहीं
फासले फिर वही तय कर जाने हैं.
हकीकत की बिजलियों से
जल गए जो ख्वाबों के दरख़्त
उन टुकड़ों को समेट लूँ ज़रा
वो एक बार फिर दफ़नाने हैं
दुनिया की इस भीड़ में
कमी नहीं है चेहरों की
नए दोस्त मिल जायेंगे तुम्हें
चलो अब उन पर सितम ढाने हैं.
टूट कर बिखर जाऊं
ऐसी नहीं मेरी फितरत
इस मन के वीराने में
कुछ नए पौधे फिर लगाने हैं.
टूटेगा आसमान से जब कोई सितारा
गुजरा वक़्त मांग लूँगा ज़रा
बना लूँगा उनको फिर अपना
तुमने कर दिए जो बेगाने हैं
इस गुस्ताख दिल की खता थी
समझ बैठा छिपे कुछ अफ़साने हैं,
आया है दौर फिर आवारापन का
अब ये दौर फिर से आजमाने हैं.
ज़िन्दगी में जो पल छूट गए
एक बार फिर से पाने हैं
तुम राह न देखना मेरी अभी
कुछ अधूरे काम निपटाने हैं.
एक बार फिर से पाने हैं
तुम राह न देखना मेरी अभी
कुछ अधूरे काम निपटाने हैं.
इतने दिन जो चले साथ तेरे
मन की हर इक राह पर
वो राह भी खो गयी कहीं
फासले फिर वही तय कर जाने हैं.
हकीकत की बिजलियों से
जल गए जो ख्वाबों के दरख़्त
उन टुकड़ों को समेट लूँ ज़रा
वो एक बार फिर दफ़नाने हैं
दुनिया की इस भीड़ में
कमी नहीं है चेहरों की
नए दोस्त मिल जायेंगे तुम्हें
चलो अब उन पर सितम ढाने हैं.
टूट कर बिखर जाऊं
ऐसी नहीं मेरी फितरत
इस मन के वीराने में
कुछ नए पौधे फिर लगाने हैं.
टूटेगा आसमान से जब कोई सितारा
गुजरा वक़्त मांग लूँगा ज़रा
बना लूँगा उनको फिर अपना
तुमने कर दिए जो बेगाने हैं
इस गुस्ताख दिल की खता थी
समझ बैठा छिपे कुछ अफ़साने हैं,
आया है दौर फिर आवारापन का
अब ये दौर फिर से आजमाने हैं.
ज़िन्दगी में जो पल छूट गए
एक बार फिर से पाने हैं
तुम राह न देखना मेरी अभी
कुछ अधूरे काम निपटाने हैं.
Thursday, February 4, 2010
घर की दाल मुर्गी बराबर
उस दिन जब दूकान पर हम बिजिनेस में मशगूल थे, अचानक मैडम का फोन आ गया ...आज दोपहर को घर आ जाना..हमने घबरा कर पुछा "क्या हुआ?..खैरियत तो है?''..वो तो तुम्हारे होते हुए भी है..उधर से जवाब आया..और यह फोन खैरियत बताने को नहीं..लंच पर बुलाने को किया है..आज तुम्हारे सुपुत्र की स्कूल में पार्टी थी तो लंच को मन नहीं है,और मैंने अरहर की दाल बनायी है,अब पूरे ९० रु./किलो की दाल को फेंक तो नहीं सकते न ..आ जाना। सुनकर मन कचोट सा गया कि दाल खराब न हो इसीलिए बुलाया जा रहा है, सो कह दिया कि आज काम बहुत है, नहीं आ सकता। यह सुनकर भुनभुना कर मैडम ने फोन पटक दिया और हम भी काम में व्यस्त हो गए।
शाम को जब फारिग हुए तो फिर वही बात ध्यान में आ गयी और मन उदास हो गया,तभी अचानक हमारे परम मित्र जफ़र टपक पड़े ,जफ़र साहब गोया मुंबई की बारिश , न आने का पता और न ही जाने का,आते ही चहके ..अमां मियाँ ,ये चेहरा ममता बनर्जी की तरह क्यूँ लटका रखा है, लोहे का भाव गिर गया क्या?..सुनकर हम भड़क गए ''तुम तो यार बस..पास बैठ जाओ तो बीवी कि कमी महसूस नहीं होने देते..कहकर हमने भी उन्हें तमाम किस्सा सुना दिया। सुनकर पहले तो जी भरकर हँसे महाशय फिर कहने लगे..यार तो इसमें गलत क्या कह दिया भाभी जी ने, तुमारी मेहनत जाया न हो इसीलिए कहा,ऐसे क्यों नहीं सोचते तुम? अब बात चूंकि हमारी मेहनत की थी तो हम भी शांत हो लिए, फिर अचानक जफ़र भाई गंभीर स्वर में बोले..''.नील, वैसे ये तो आजकल की हकीकत हो गयी है,अभी सब्जी मंडी में था तो एक सज्जन सारे भाव सुनकर अपने बेटे को समझाने लगे चलो बेटा नमक अजवाइन के परांठे खायेंगे,कितने दिन हो गए और अच्छे भी कितने लगते हैं..सुनकर मन भर आया यार।
इस बात पर हमने भी अपने मन की भड़ास निकाल दी..दुरूस्त फरमाया यार , अब देखो बड़े बूढ़े कह गए कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ, तो अब दाल खाना हर किसी के बस का रह गया क्या?? पहले कहा जाता था..दाल रोटी खाने वाला यानी सादा जीवन जीने वाला, आज के दौर में कोई कह बैठा तो लोग तिरछी नजर से देखेंगे और कहेंगे कि देखो कैसे शान मार रहा है, देखना उस्ताद, एक दिन यह सिक्योरिटी गार्ड बैंकों और सर्राफों की जगह किराने और डिपार्टमेंटल स्टोरों पर दिखाई देंगें, अगर यही हाल रहा तो एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमको भी बाजार से सामान लेने जाना होगा तो एक बंदूकची ले जाना पड़ेगा...पता नहीं हमारे देश की सरकार कब जागेगी..सुन कर जफ़र भाई जोर से हँसे और बोले ''अमां मियाँ, सरकार क्या करेगी इसमें? पहले तो मुल्क की आबादी देखो,बेचारे सायिन्स्दान कितना भी पैदावार बढ़ा दें, हम लोग उनसे भी ज्यादा गिनती बढ़ा देते हैं, वो बेचारे भी क्या करें, फिर दूसरे सरकार को भी जिन बाहुबलियों और पूंजीपतियों ने चुनाव के समय याद रखा, उसकी धन और बल दोनों से मदद की तो उनका कर्जा भी तो उतारना है उसको, तो मार तो आम आदमी पर ही पड़ेगी यार और तीसरे ये वायदा कारोबार जो सरकार की तरफ से एक तोहफा है ज़ुबानी जमाखर्च करने वालों को, चीज कि पैदावार हो न हो बस हवा में खरीद लो और बेच लो, मुनाफा लो या फिर दे दो और आराम से घर का रुख करो, तुम्हारा चाहे जो हो यह काम कराने वाले कि चांदी ही चांदी, अभी तुम अरहर कि दाल का जिक्र कर रहे थे तो सुनो मियाँ इस अरहर की दाल के वायदा कारोबार में ही इस साल १८० अरब रूपये के वारे न्यारे हो गए हैं, अब ये प्रसाद तो इस सिस्टम के हर हिस्से को मिलेगा न तो इस नामुराद महंगाई को कौन रोके?
हालात की सही बयानी पर हम कह भी क्या सकते थे तो चुप रहना ही उचित लगा,फिर बात को आख़िरी मोड़ देने की कोशिश करने लगे..तो तुम कहना चाहते हो कि हम बस चुपचाप सारा तमाशा देखते रहें और लुटते रहें?..जफ़र भाई मुस्कुरा कर बोले,'' देखो दोस्त अब तुम इसको एक चुनौती के तौर भी ले सकते हो..बस जमकर लग जाओ काम धाम में और कीमतों से ज्यादा अपनी आमदनी बढाने की कोशिश करो, शायद हमारे वजीरेआला भी यही चाहते हैं.'' सुनकर बेसाख्ता हमारी हंसी निकल गयी..ये खूब कहा हुजूर, हर समस्या को हल कि तरह सिर्फ तुम्ही पेश कर सकते हो, मान गए उस्ताद..चलो ये ही सही. अब मन कुछ हल्का हो लिया और वक़्त का तकाजा भी था तो हम भी घर जाने को उठ लिए.
ज्यों ही घर पहुंचे तो घुसते ही एक सोंधी सी महक हमें अपनी और खींचने लगी, देखा तो बच्चे सुकून से बैठकर वेज बिरयानी उड़ा रहे थे और हमारी मैडम उन पर बलिहारी हो रही थीं, देख कर मन बल्लियों उछलने लगा और हम भी जल्दी से कुर्सी खींच कर बैठ गए और अपनी प्लेट का इन्तजार करने लगे..देखा तो वहां अरहर की दाल हमको मुंह चिढ़ा रही थी, हमको ताव आ गया और कह बैठे'' अब हमारे लिए ये दाल ही बची है क्या?'' तभी मैडम गुर्राकर बोलीं..डाक्टर ने मना किया है, भूल गए और वैसे भी तुम तो मेरे लाख मना करने के बाद भी अक्सर ही इधर उधर जाकर अपना पसंदीदा चिकन खा ही लेते हो,आज दोपहर को नहीं आये तो दाल अब खानी पड़ेगी, तुम्हारे उस मुए चिकन से ज्यादा महंगी चीज दे रही हूँ और तुम खामखाह का नाटक कर रहे हो , आज के दौर में चिकन दाल की क्या बराबरी करेगा ? , मौके की नजाकत को समझ कर हम भी चुप हो लिए और उस दाल रोटी को चबा कर उसी में ही मुर्गी के स्वाद को तलाश करने की असफल कोशिश में लग गए. ...
इस बात पर हमने भी अपने मन की भड़ास निकाल दी..दुरूस्त फरमाया यार , अब देखो बड़े बूढ़े कह गए कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ, तो अब दाल खाना हर किसी के बस का रह गया क्या?? पहले कहा जाता था..दाल रोटी खाने वाला यानी सादा जीवन जीने वाला, आज के दौर में कोई कह बैठा तो लोग तिरछी नजर से देखेंगे और कहेंगे कि देखो कैसे शान मार रहा है, देखना उस्ताद, एक दिन यह सिक्योरिटी गार्ड बैंकों और सर्राफों की जगह किराने और डिपार्टमेंटल स्टोरों पर दिखाई देंगें, अगर यही हाल रहा तो एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमको भी बाजार से सामान लेने जाना होगा तो एक बंदूकची ले जाना पड़ेगा...पता नहीं हमारे देश की सरकार कब जागेगी..सुन कर जफ़र भाई जोर से हँसे और बोले ''अमां मियाँ, सरकार क्या करेगी इसमें? पहले तो मुल्क की आबादी देखो,बेचारे सायिन्स्दान कितना भी पैदावार बढ़ा दें, हम लोग उनसे भी ज्यादा गिनती बढ़ा देते हैं, वो बेचारे भी क्या करें, फिर दूसरे सरकार को भी जिन बाहुबलियों और पूंजीपतियों ने चुनाव के समय याद रखा, उसकी धन और बल दोनों से मदद की तो उनका कर्जा भी तो उतारना है उसको, तो मार तो आम आदमी पर ही पड़ेगी यार और तीसरे ये वायदा कारोबार जो सरकार की तरफ से एक तोहफा है ज़ुबानी जमाखर्च करने वालों को, चीज कि पैदावार हो न हो बस हवा में खरीद लो और बेच लो, मुनाफा लो या फिर दे दो और आराम से घर का रुख करो, तुम्हारा चाहे जो हो यह काम कराने वाले कि चांदी ही चांदी, अभी तुम अरहर कि दाल का जिक्र कर रहे थे तो सुनो मियाँ इस अरहर की दाल के वायदा कारोबार में ही इस साल १८० अरब रूपये के वारे न्यारे हो गए हैं, अब ये प्रसाद तो इस सिस्टम के हर हिस्से को मिलेगा न तो इस नामुराद महंगाई को कौन रोके?
हालात की सही बयानी पर हम कह भी क्या सकते थे तो चुप रहना ही उचित लगा,फिर बात को आख़िरी मोड़ देने की कोशिश करने लगे..तो तुम कहना चाहते हो कि हम बस चुपचाप सारा तमाशा देखते रहें और लुटते रहें?..जफ़र भाई मुस्कुरा कर बोले,'' देखो दोस्त अब तुम इसको एक चुनौती के तौर भी ले सकते हो..बस जमकर लग जाओ काम धाम में और कीमतों से ज्यादा अपनी आमदनी बढाने की कोशिश करो, शायद हमारे वजीरेआला भी यही चाहते हैं.'' सुनकर बेसाख्ता हमारी हंसी निकल गयी..ये खूब कहा हुजूर, हर समस्या को हल कि तरह सिर्फ तुम्ही पेश कर सकते हो, मान गए उस्ताद..चलो ये ही सही. अब मन कुछ हल्का हो लिया और वक़्त का तकाजा भी था तो हम भी घर जाने को उठ लिए.
ज्यों ही घर पहुंचे तो घुसते ही एक सोंधी सी महक हमें अपनी और खींचने लगी, देखा तो बच्चे सुकून से बैठकर वेज बिरयानी उड़ा रहे थे और हमारी मैडम उन पर बलिहारी हो रही थीं, देख कर मन बल्लियों उछलने लगा और हम भी जल्दी से कुर्सी खींच कर बैठ गए और अपनी प्लेट का इन्तजार करने लगे..देखा तो वहां अरहर की दाल हमको मुंह चिढ़ा रही थी, हमको ताव आ गया और कह बैठे'' अब हमारे लिए ये दाल ही बची है क्या?'' तभी मैडम गुर्राकर बोलीं..डाक्टर ने मना किया है, भूल गए और वैसे भी तुम तो मेरे लाख मना करने के बाद भी अक्सर ही इधर उधर जाकर अपना पसंदीदा चिकन खा ही लेते हो,आज दोपहर को नहीं आये तो दाल अब खानी पड़ेगी, तुम्हारे उस मुए चिकन से ज्यादा महंगी चीज दे रही हूँ और तुम खामखाह का नाटक कर रहे हो , आज के दौर में चिकन दाल की क्या बराबरी करेगा ? , मौके की नजाकत को समझ कर हम भी चुप हो लिए और उस दाल रोटी को चबा कर उसी में ही मुर्गी के स्वाद को तलाश करने की असफल कोशिश में लग गए. ...
Tuesday, January 19, 2010
जीवन बोध
जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा ''कांच का जार और दो कप चाय ''हमें जीवन का सार कुछ यूँ समझा जाती है --
दर्शनशाश्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पदाने वाले हैं...
उन्होंने अपने साथ लायी एक कांच का बड़ा जार टेबल पर रखा और उसमें टेबिल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे ,जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची .....उन्होंने छात्रों से पूछा-क्या जार पूरा भर गया?
हाँ...आवाज आई...फिर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरू किये. धीरे-धीरे जार को हिलाया तो काफी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी ,समा गए। फिर प्रोफ़ेसर साहब ने रेत कि थैली से हौले-हौले उस जार में रेत डालना शुरू किया,वह रेत भी उस जार में जहाँ तक संभव था ,बैठ गया,अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे...फिर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा,क्यों अब तो जार पूरा भर गया न?
हाँ....अब तो पूरा भर गया है...सभी ने एक स्वर में कहा...सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसकी चाय जार में डाली ,चाय भी रेत के बीच स्थित थोड़ी सी जगह में सोख ली गयी...
प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरू किया।
इस कांच के जार को तुम लोग अपना जीवन समझो।
टेबल टेनिस कि गेंदें सबसे महत्त्वपूर्ण भाग अर्थात ईश्वर,परिवार ,बच्चे, स्वास्थ्य और शौक हैं,
छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बड़ा मकान आदि हैं।
और रेत का मतलब और कई छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे हैं...
अब यदि तुमने कांच के जार में सबसे पहले रेत को भरा होता तो टेबिल टेनिस कि गेंदों और कंकरों के लिए जगह ही नहीं बचती या कंकर भर दिए होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी।
...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है..यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पड़े रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिए अधिक समय नहीं रहेगा...मन के सुख के लिए क्या जरूरी है , ये तुम्हें तय करना है।
अपने बच्चों के साथ खेलो,बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर फेंको,मेडिकल चेकअप करवाओ...टेबिल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्त्वपूर्ण है...पहले तय करो कि क्या जरूरी है?
..............बाकी सब तो रेत है.......
छात्र बड़े ध्यान से सुन रहे थे...अचानक एक ने पुछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि ''चाय के दो कप'' क्या हैं? प्रोफ़ेसर मुस्कुराए, बोले..मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया?
इसका उत्तर यह है कि जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने ख़ास मित्रों के साथ दो कप चाय पीने कि जगह हमेशा होनी चाहिए।
-साभार अज्ञात स्रोत्र
दर्शनशाश्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पदाने वाले हैं...
उन्होंने अपने साथ लायी एक कांच का बड़ा जार टेबल पर रखा और उसमें टेबिल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे ,जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची .....उन्होंने छात्रों से पूछा-क्या जार पूरा भर गया?
हाँ...आवाज आई...फिर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरू किये. धीरे-धीरे जार को हिलाया तो काफी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी ,समा गए। फिर प्रोफ़ेसर साहब ने रेत कि थैली से हौले-हौले उस जार में रेत डालना शुरू किया,वह रेत भी उस जार में जहाँ तक संभव था ,बैठ गया,अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे...फिर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा,क्यों अब तो जार पूरा भर गया न?
हाँ....अब तो पूरा भर गया है...सभी ने एक स्वर में कहा...सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसकी चाय जार में डाली ,चाय भी रेत के बीच स्थित थोड़ी सी जगह में सोख ली गयी...
प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरू किया।
इस कांच के जार को तुम लोग अपना जीवन समझो।
टेबल टेनिस कि गेंदें सबसे महत्त्वपूर्ण भाग अर्थात ईश्वर,परिवार ,बच्चे, स्वास्थ्य और शौक हैं,
छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बड़ा मकान आदि हैं।
और रेत का मतलब और कई छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे हैं...
अब यदि तुमने कांच के जार में सबसे पहले रेत को भरा होता तो टेबिल टेनिस कि गेंदों और कंकरों के लिए जगह ही नहीं बचती या कंकर भर दिए होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी।
...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है..यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पड़े रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिए अधिक समय नहीं रहेगा...मन के सुख के लिए क्या जरूरी है , ये तुम्हें तय करना है।
अपने बच्चों के साथ खेलो,बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर फेंको,मेडिकल चेकअप करवाओ...टेबिल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्त्वपूर्ण है...पहले तय करो कि क्या जरूरी है?
..............बाकी सब तो रेत है.......
छात्र बड़े ध्यान से सुन रहे थे...अचानक एक ने पुछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि ''चाय के दो कप'' क्या हैं? प्रोफ़ेसर मुस्कुराए, बोले..मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया?
इसका उत्तर यह है कि जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने ख़ास मित्रों के साथ दो कप चाय पीने कि जगह हमेशा होनी चाहिए।
-साभार अज्ञात स्रोत्र
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