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Sunday, July 25, 2010

स्वार्थी नील

वो एक शनिवार की  शाम... फिर कोई मॉल..किसी फिल्म का देखना..
पत्नी की खरीदारी..बच्चों की फरमाइश..
पर इस सबसे पहले ही..
सामने आ गया अनायास वो बच्चा..
कपड़ों के नाम पर थे कुछ चीथडे ..
झुर्रियों से बना मासूम  चेहरा..
आखों में  आंसू कम और सूनापन  ज्यादा..
निराशा से संपन्न सूरत.
एक बचपन जैसा कुछ ..  बुढ़ापे की  ओर बढता हुआ ..
उस खोमचे के नीचे पड़े  झूठे पत्तों में कुछ तलाशता हुआ..
खामखाह  आ गया मेरा पास और कह उठा..
बाबूजी ..बहुत भूख लगी है..कुछ मिलेगा क्या..
मन द्रवित हो आया..दिल कचोट गया..
पर जेब में छुट्टा निकला ही नहीं  ..
और मैं आ गया अन्दर..चुपचाप..अपनों के पास..
...देखते ही बोले..चलो अब बर्गर खायेंगे....भूख लगी है..
बस ५०० के नोट में आ गए वो और कुछ  टाफियां..
सब खुश ..चहकना..खिलखिलाना..पर अचानक वहां  हवा विलुप्त होने लगी..
घुटन बढ़ने लगी..जबकि एसी तो था वहां..
लगा जैसे बेहोश हो जाऊँगा..
सो खुली हवा में सांस लेने बाहर आ गया...
पर सामने था फिर वही मंजर..
वही बचपन..वही पत्ते.. वही आँखें..
पैर अनायास ही उधर बढ़ने  लगे..
साथ ही उन आँखों में आशा भी ..
मैं  भी कह उठा उस खोमचे वाले से..
इसको खिलाना सब जो ये चाहे..
अचानक हवा का तेज झोंका आया..
मौसम सुहाना सा होने लगा...घुटन अब नदारद थी..
अन्दर वो सब खुश थे और अब बाहर मैं  भी..
इंसान भी कितना स्वार्थी होता है...
है न??