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Thursday, February 4, 2010

घर की दाल मुर्गी बराबर


उस दिन जब दूकान पर हम बिजिनेस में मशगूल थे, अचानक मैडम का फोन गया ...आज दोपहर को घर जाना..हमने घबरा कर पुछा "क्या हुआ?..खैरियत तो है?''..वो तो तुम्हारे होते हुए भी है..उधर से जवाब आया..और यह फोन खैरियत बताने को नहीं..लंच पर बुलाने को किया है..आज तुम्हारे सुपुत्र की स्कूल में पार्टी थी तो लंच को मन नहीं है,और मैंने अरहर की दाल बनायी है,अब पूरे ९० रु./किलो की दाल को फेंक तो नहीं सकते .. जाना। सुनकर मन कचोट सा गया कि दाल खराब हो इसीलिए बुलाया जा रहा है, सो कह दिया कि आज काम बहुत है, नहीं सकता यह सुनकर भुनभुना कर मैडम ने फोन पटक दिया और हम भी काम में व्यस्त हो गए


शाम को जब फारिग हुए तो फिर वही बात ध्यान में गयी और मन उदास हो गया,तभी अचानक हमारे परम मित्र जफ़र टपक पड़े ,जफ़र साहब गोया मुंबई की बारिश , आने का पता और ही जाने का,आते ही चहके ..अमां मियाँ ,ये चेहरा ममता बनर्जी की तरह क्यूँ लटका रखा है, लोहे का भाव गिर गया क्या?..सुनकर हम भड़क गए ''तुम तो यार बस..पास बैठ जाओ तो बीवी कि कमी महसूस नहीं होने देते..कहकर हमने भी उन्हें तमाम किस्सा सुना दिया। सुनकर पहले  तो जी भरकर हँसे महाशय फिर कहने लगे..यार तो इसमें गलत क्या कह दिया भाभी जी ने, तुमारी मेहनत जाया हो इसीलिए कहा,ऐसे क्यों नहीं सोचते तुम? अब बात चूंकि हमारी मेहनत की थी तो हम भी शांत हो लिए, फिर अचानक जफ़र भाई गंभीर स्वर में बोले..''.नील, वैसे ये तो आजकल की हकीकत हो गयी है,अभी सब्जी मंडी में था तो एक सज्जन सारे भाव सुनकर अपने बेटे को समझाने लगे चलो बेटा नमक अजवाइन के परांठे खायेंगे,कितने दिन हो गए और अच्छे भी कितने लगते हैं..सुनकर मन भर आया यार

इस बात पर हमने भी अपने मन की भड़ास निकाल दी..दुरूस्त फरमाया यार  , अब देखो बड़े बूढ़े कह गए कि दाल रोटी खाओ  प्रभु के गुण गाओ, तो अब  दाल खाना हर किसी के बस का रह गया क्या?? पहले कहा जाता था..दाल रोटी खाने वाला यानी सादा  जीवन   जीने वाला, आज के दौर में कोई कह बैठा तो लोग तिरछी नजर से देखेंगे  और कहेंगे कि देखो कैसे शान मार रहा है,  देखना उस्ताद, एक दिन यह सिक्योरिटी गार्ड बैंकों और सर्राफों की जगह किराने और डिपार्टमेंटल स्टोरों पर दिखाई देंगें, अगर यही हाल रहा तो एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमको भी बाजार से सामान लेने जाना होगा तो एक बंदूकची ले जाना पड़ेगा...पता नहीं हमारे देश की सरकार कब जागेगी..सुन कर जफ़र भाई जोर से हँसे और बोले ''अमां मियाँ, सरकार क्या करेगी इसमें? पहले तो मुल्क की आबादी देखो,बेचारे सायिन्स्दान कितना भी पैदावार बढ़ा दें, हम लोग उनसे भी ज्यादा गिनती बढ़ा देते हैं, वो बेचारे भी क्या करें, फिर दूसरे सरकार को भी जिन बाहुबलियों और पूंजीपतियों ने चुनाव के समय याद रखा, उसकी धन और बल दोनों से मदद की तो उनका कर्जा भी तो उतारना है उसको, तो मार तो आम आदमी पर ही पड़ेगी यार और तीसरे ये वायदा कारोबार जो सरकार की तरफ से एक तोहफा है ज़ुबानी जमाखर्च   करने वालों को, चीज कि पैदावार हो न हो बस हवा में खरीद लो और बेच लो, मुनाफा लो या फिर दे दो और आराम से घर का रुख करो, तुम्हारा चाहे जो हो यह काम कराने वाले कि चांदी ही चांदी, अभी तुम अरहर कि दाल का जिक्र कर रहे थे तो सुनो मियाँ इस अरहर की  दाल के वायदा कारोबार में ही इस साल १८० अरब रूपये के वारे न्यारे हो गए हैं, अब ये प्रसाद  तो इस सिस्टम के हर हिस्से को मिलेगा न तो इस नामुराद महंगाई को कौन रोके?


हालात की सही बयानी पर हम कह भी क्या सकते थे तो चुप रहना ही उचित लगा,फिर बात को आख़िरी मोड़ देने की कोशिश करने लगे..तो तुम कहना चाहते हो कि हम बस चुपचाप सारा तमाशा देखते रहें और लुटते रहें?..जफ़र भाई मुस्कुरा कर बोले,'' देखो दोस्त अब तुम इसको एक चुनौती के तौर भी ले सकते हो..बस जमकर लग जाओ काम धाम में और कीमतों से ज्यादा अपनी आमदनी बढाने की  कोशिश करो, शायद हमारे वजीरेआला भी यही चाहते हैं.''  सुनकर बेसाख्ता हमारी हंसी निकल गयी..ये खूब कहा हुजूर, हर समस्या को हल कि तरह सिर्फ तुम्ही पेश कर सकते हो, मान गए उस्ताद..चलो ये ही सही.  अब मन कुछ हल्का हो लिया और वक़्त का तकाजा  भी था तो हम भी घर जाने को उठ लिए.

ज्यों ही घर पहुंचे तो घुसते ही एक सोंधी सी  महक  हमें अपनी और खींचने लगी, देखा तो बच्चे सुकून से बैठकर वेज बिरयानी उड़ा रहे थे  और हमारी मैडम उन पर बलिहारी हो रही थीं, देख कर  मन बल्लियों उछलने  लगा और हम भी जल्दी से कुर्सी खींच कर बैठ गए  और अपनी प्लेट का इन्तजार करने लगे..देखा तो वहां अरहर की दाल हमको मुंह चिढ़ा रही थी, हमको ताव आ गया और कह बैठे'' अब हमारे लिए ये दाल ही बची है क्या?'' तभी मैडम गुर्राकर बोलीं..डाक्टर ने मना किया है, भूल गए और वैसे भी तुम तो  मेरे लाख मना करने के बाद भी अक्सर ही इधर उधर जाकर अपना पसंदीदा चिकन खा ही लेते हो,आज  दोपहर को नहीं आये तो दाल  अब खानी पड़ेगी, तुम्हारे उस मुए चिकन से ज्यादा महंगी चीज दे रही हूँ और तुम खामखाह का नाटक कर रहे हो , आज के दौर में चिकन दाल की क्या बराबरी करेगा ? , मौके  की नजाकत को समझ कर हम भी चुप हो लिए और उस दाल रोटी को चबा कर उसी में ही मुर्गी के स्वाद  को तलाश करने की असफल  कोशिश में लग गए. ...

2 comments:

its me said...
This comment has been removed by a blog administrator.
vineet said...

so true....well written......waiting it on srijan