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Wednesday, March 17, 2010

किस्सा एक मुठभेड़ का

सुबह जों  ही मैं  घर के दरवाजे पर आया
एक अजनबी को अपने सामने खड़ा  पाया,
आते ही अतिथि देवो भव: को सिद्ध किया
और बिन  कहे ही हमारे पलंग पर बैठ गया,
पहले तो हम शरीफ इंसान की तरह डर गए 
फिर हिम्मत बाँधी और उस पर चढ़ गए,
शर्म नहीं आती जो ऐसे घुसे चले आते हो
कौन हो तुम और किससे मिलना चाहते हो,
वो हंस कर बोला   तुमसे ही काम है
मिलना था जरूरी  और गम मेरा नाम है,
तुमसे एक शिकायत है बरसों पुरानी
अपना नहीं समझते करते हो  नादानी,
जब भी किसी बहाने से चला  आता हूँ
तुम्हारे दिल में जगह कभी  नहीं पाता हूँ,
हमेशा जिन्दादिली को अपना लेते हो
तुम इंसान होकर मुझको दगा देते हो,
मेरे साथ रहोगे तो सही अर्थों में कवि बन पाओगे
वरना गहरे में नहीं बस ऊपर से ही निकल जाओगे,
जब भी तुम्हारे साथ रहने की सोची है,
तुमने झटक दिया मुझे तकलीफ बड़ी  होती है,
तुम क्यूँ हर दुःख तो अपना बना लेते हो
हर हाल में भी कैसे मुस्कुरा लेते हो,
मैं  रहूँगा तो इंसानी रिश्तों को समझोगे
कौन अपना कौन बेगाना इस हकीकत को समझोगे,
दुनिया में सभी जन  मेरे बन्धु  मेरे सगे हैं
फिर तुम में कौन से सुरखाब के पर लगे हैं,
आज तो बस मन में  यही  ठान कर आया हूँ
तुम जतन लाख  करो मैं अपना बनाने आया हूँ,
मैंने हंस कर कहा दोस्त तुम गलत जगह आ गए हो
यहाँ तुम्हारी कद्र नहीं तुम पता गलत पा गए हो,
ज़िन्दगी तुम बिन गुजारना  ही मेरा मकसद  है
ज़िन्दगी हमनवा  मेरी ख़ुशी ही मेरी उल्फत है,
मुझे खुद को अब तुझसे दूर ही रखना है
क़यामत के दिन खुदा को जवाब भी तो देना है,
नामी कवि बन जाने  की यह  कीमत नहीं दे पाऊंगा
मैं ऊपर ही मजे में हूँ गहरे में शायद  डूब जाऊँगा,
चल  आ आज तुझे तेरी औकात बताता हूँ
अपने जीवन में तुझे तेरी जगह दिखाता हूँ,
मन के पिछवाड़े एक छोटी अँधेरी कोठरी पर उसे  ले गया
जहाँ अपना भयानक प्रतिबिम्ब देख गम तो डर गया,
हंस कर कहा मैंने अब क्यों खड़े हो आँखों को मींचे
आखिर आ ही गया न आज  ऊँट पहाड़ के नीचे,
अहमियत ख़ुशी की बनी रहे सो  तुझे  सह लेता  हूँ
इसी वजह से कभी कभी मैं  रोटी पानी दे देता हूँ,
मेरी इस कोठरी तक किसी की भी  पहुँच नहीं
तू रहता है साथ यहाँ  किसी को खबर तक नहीं,
सुनकर गम का चेहरा तो उतर गया
यह क्या वो तो खुद ग़मगीन  हो गया,
बोला तुझसे सर टकराना वक़्त जाया करना है 
मुझको नहीं इस काल कोठरी में रहना है, 
अब आ गया हूँ तो खाली हाथ तो न जाऊँगा 
मुझको किसी सुखी का पता दे मैं  वहीँ बस जाऊँगा, 
सुनकर हमारे दिमाग का शैतानी घोड़ा दौड़ गया
मन के एक कोने में अपने पड़ोसी का पता छोड़ गया,
जो हमसे कहीं ज्यादा गुणी, धनिक और खुशहाल था
हमारे महल्ले में कहो तो लोकप्रियता की एक मिसाल था,
तो हमने गम को अपने पड़ोसी का पता बता दिया
और इस तरह अपना पड़ोसी धर्म निभा दिया.

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