हर सुबह अपने जमीर से अदावत देखी,
आज फिर रोटी की ये हिमाकत देखी.
खो गयी है कहीं, खुद्दारी कहते थे जिसे,
हमने अब से रोटी की ये जलालत देखी.
मंदिर मस्जिद में भीड़ तो है, इंसान नहीं,
ज़माना भर में रोटी की ये इबादत देखी.
जो थका जिस्म, बेसुध सोया गाफिल होकर,
रात भर को रोटी की ये मुहब्बत देखी.
दफ़न करके इंसानियत,"इंसान" बन गए हम,
अब तो हर तरफ रोटी की ये वहशत देखी.
खुद के रंजो गम कुछ इस तरह भूले "नील",
वक़्त की दौड़ में रोटी की ये शराफत देखी.

1 comment:
Kamaal likha hai bhaijaan.. :)
Roti ki saari pol khol di.
Bahut sundar.. Likhte rahiye.
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