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Friday, June 11, 2010

तुम्हारा इंतज़ार.....

इस शब् को फिर से  सुबह का इंतज़ार सा क्यूँ है,
जो तू नहीं तो दिल मेरा बेजार सा क्यूँ है.

मेरी निगाहों से निगाहें चुरा तो  लीं  उसने,
पलकों की जुम्बिश में वो फिर  इकरार सा क्यूँ है.

दामन भी उसका  जो छू ले कोई  भी  नजर,
दिल को मेरे  इतना भी इनकार सा क्यूँ है.

कुछ और जब  कहती थी चेहरे की वो नमी,
फिर उसके कहे से मुझे सरोकार सा क्यूँ है.

जो कांच के टुकड़े भी उठाये  करीने से,
दिल तोड़ने का वो ही  तलबगार सा क्यूँ है.

माथे पे उसके  लट जो  आवारा सी  फिरे  है,
इक दिन  मैं सवारूँगा ये ऐतबार सा क्यूँ है.

दिल का जो अक्स था वो चेहरे  पर न  उतरा ,
तू बन बैठा इतना मगर  होशियार सा क्यूँ है.

तनहा मैं  जब भी आया  आईने के सामने,
चटक के उसका टूटना  हर  बार सा  क्यूँ है.

जो ख़्वाबों में  न आ सको अब तुम मेरे कभी  ,
ये वक़्त इतना तेज़ रफ़्तार सा क्यूँ है.

आज़ाद हुआ इश्क भी अब क़ैद ए वफ़ा  से
जो प्यार था  कभी वो अब व्यापार सा क्यूँ  है.

रास्ता-ए-मुस्तकबिल जो  पा  लिया तुमने,
रुकने को अब कदम ये  बेकरार सा  क्यूँ है.

उल्फत ये खुदा की नहीं तामीर कोई  "नील"
मुहब्बत-ए-नतीजे पर फिर इख्तियार सा क्यूँ है.

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