क्यूँ मैंने कहा था..
गर कह भी दिया था..
तो क्या इतना बड़ा सच था वो..
कि अब उस कहे का गूँज..
सुनाई देती रहेगी..
मेरे तुम्हारे बीच..
हर वक़्त..
हर लम्हा..
मेरे कहने से पहले तो ..
ऐसा न था..
तुम मिलती थीं.. बेपरवाह सी..
वही मासूम हंसी..वही भोलापन..
मैं भी तो हंस लेता था बस तुम्हारे साथ ही..
और उसी एक पल में ..तुम पूछ बैठी थीं..
तुम दोगे न मेरा साथ ...ज़िन्दगी भर???
और मैं अनजान कह बैठा..यही..
फिर ऐसा क्या हुआ कि बस..
तुम मिलती तो हो अब भी..
पर ये हंसी वो नहीं है..
न चेहरे पर अब है मासूमियत..
कुछ डर बचा है
..और थोडा सा..
टूटे हुए विश्वास का सच..
पर मैंने ऐसा भी क्या कह दिया था??..
बस यही तो...
"वक़्त के साथ हालात भी बदलते हैं और ..
इंसान भी.."

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